सफरनामा
सफर भी अनुभव के नए नए अध्याय खोलता है।
पास वाली बर्थ पर महाशय फोन पर जोर जोर से बातें किये जा रहे थे।चलो बातों तक तो ठीक है जनाब बड़ी बेफिक्री में धड़ल्ले से गालियों का प्रयोग किये जा रहे थे।
अब जो वार्तालाप हुआ,सुनिए
मैं...(महाशय की धर्मपत्नी से) आपके पति क्या ऐसे ही गालियों का प्रयोग करते हैं?
महाशय की पत्नी,(मुस्कुराते हुए)...इनको आदत है,ऐसे ही बात करते हैं।
मैं,... मगर मेरी आदत नही ऐसे शब्द सुनने की।
महाशय की पत्नी,...तो अपने कान बन्द कर लीजिए।
मैं.... क्यों,मेरा क्या कसूर है जो मैं ऐसे अपशब्द सुनू। आप गलत बात का पक्ष ले रही हैं,क्या आप जानती है यह ?
तभी मेरी मित्र भी कह उठी....हम कान बन्द करे और आप गलत बोलना बन्द नही कर सकते।
सामने सन्नाटा छा गया।पत्नी की बोलती बंद और महाशय भी खिसिया कर चुप कर गए।
मैं और मेरी मित्र भी अपनी बातों में यही चर्चा करने लगे कि पतियों की गलत हरकतों में पत्नियों का कितने प्रतिशत हाथ होता है।
विनय...दिल से बस यूं ही।