छोटी-छोटी बातों पर जब क्रोधित वे हो जाते हैं
मेरा मन भी जेठ की दुपहरी बन जाता है ।
दोष है मेरा या अपनी दुर्बलता वे यूँ छुपाते हैं ,
सोच-सोच मस्तिष्क मेरा कचहरी बन जाता है ।।
काम का दबाव है , दबाव धन कमाने का
भौतिक सुख की चीजों में तन-मन-धन-प्राण गँवाने का
फल है यह विज्ञापन की दुनिया को देख लुभाने का
विज्ञापन में देखके नई-नई चीजें जब घर लाते हैं
प्रकृति से तोड़के नाता दिल कृत्रिम बन जाता है ।
दोष है मेरा या अपनी दुर्बलता वे यूँ छुपातें हैं
सोच-सोच मस्तिष्क मेरा कचहरी बन जाता है ।।
क्षुद्र स्वार्थ में अंध-बधिर कभी परमारथ भी देख औ' सुन
सुख-दुख के धागे से जीवन-वसन का ताना-बाना बुन
सीख ले कष्ट सहन करना , धारण कर धैर्य-क्षमा का गुण
क्षमा-सहिष्णुता छोडके जब मानव दानव हो जाते हैं
आक्रामक व्यवहार अहं के महा प्रहरी बन जाता है ।
दोष है मेरा या अपनी दुर्बलता वे यूँ छुपाते हैं ,
सोच-सोच मस्तिष्क मेरा कचहरी बन जाता है ।।
छोटी-छोटी बातों पर जब क्रोधित वे हो जाते हैं
मेरा मन भी जेठ की दुपहरी बन जाता है ।
दोष है मेरा या अपनी दुर्बलता वे यूँ छुपाते हैं ,
सोच-सोच मस्तिष्क मेरा कचहरी बन जाता है ।।