परनिंदा रस से बड़ा कोई रस नहीं , तो जी भरकर दुसरो की निंदा कीजिये , यह आपके मन को काफी शांति दिलायेगा , निंदा करके आप इस भ्रम में जी लेते है कुछ क्षण को कि आप सही है और दूसरा ग़लत । कीजिये ख़ूब कीजिये उनकी निंदा , जिनसे आप जलते है ,ईर्ष्या रखते है। ... लोगों को ढूंढ - ढूंढकर कीजिये , जब कोई न मिले तो शीशे के सामने खड़े होकर खुद से ही कोजिये।पर कीजिये ज़रुर । यह आपके मन की भड़ांस निकालेगी और जिस की आप निंदा कर रहे है उसको ख़ुद में सुधार करने का रास्ता दिखाएगी।