पुकारना तुम्हें नहीं आता
रिझाना हमें नही आता
कुछ पल को ठहरी और
जिन्दगी खामोश सी हो गई
इक हुनर है जो हमें नहीं आता
इक यही हुनर ही तुम्हें नहीं आता
बीत जाएगा वक़्त यूँ ही रफ्ता रफ्ता
देखना दोनो का अंदाज बदल जायेगा
गर तुम भूल जाओगे हमें तो
याद फिर तुम्हें भी कौन रखेगा
हम खुद से इश्क करने वालों में है
खुदाई में तुम्हारा जिक्र कौन करेगा
हुस्न जब कयामत पर उतरेगा
इश्क का रुआब कहाँ रह पाएगा
खुश रहिये खुदी के तक्खलुस में
दीदार-ए-यार तयशुदा वक़्त होगा
विनय...दिल से बस यूँ ही