प्रदूषण रोशनी का
हर जगह इस कद्र फैला है ।
रात आँखों में कटती है ,
रात के इंतजार में ।।
अंधेरा ढूँढती हैं आँखें
दो से चार होने को
तड़पता मन फड़कता तन है ,
एकाकार होने को
मगर प्रकाश का पहरा
हमें मिलने नहीं देता
जिंदगी बीत जाएगी
तड़पते सूने प्यार में ।
रात आँखों में कटती है ... ।।
अंधेरा ढूँढ़ता मजदूर
सड़कों के उजालों में
रात भी दिन-सा दिखती है ,
नौकरी के निवालों में
देह श्रम से थकी है ,
आँखों पर निंदिया का बोझा है
अकिंचन तम कहाँ से पाएगा ?
थोड़ी पगार में ।
रात आँखों में कटती हैं ,
रात के इंतजार में ।।