मेरे पापा सा न कोई था न होगा
बस एक मलाल क्यों छोड़ा अकेला
मायका था मेरा गुलजार उनसे
देकर साथी प्यारा,हाथ छुड़ा लिया
एक दिन की बस बात नहीं है ये
साथ हो मेरे हर दिन हर पल ही
नाजों से पली,मगर नाजुक नहीं
आपकी हर बात हूबहू मेरे संग ही
29 साल पहले की ये बात है
नामुराद दिन आज भी वो मुझे याद है
काश इतनी ताक़त मेरे हाथों में होती
कैलेंडर की वो तिथि मैं मिटा देती।
एक मजबूत शख्सियत रहे हमेशा
कमजोरी आपकी बस प्यार ही रहा
वो मजबूती और कमजोरी सारी मुझे देकर
खुद कैसे इतने आजाद हो गए आप पापा
विनय......दिल से बस यूँ ही
......हर पल पापा को महसूस करती हुई