इन्तहा हो गयी है मेरे डर की,
इन्तहा हो गयी है मेरे डर की,
मैं खुद से भी डरने लगी हूँ ।
गड़ी हैं निगाहें मुझ पर जमाने भर की ,
हर कदम डरके धरने लगी हूँ।।
सूरत से निरपराधी था ।
उस रोज सफर में साथी था ।
उसके अनायास स्पर्श से
मैं थोड़ी शंकित-सी हो गयी ।
अनजाने संकट के भय से
मैं थोड़ी कंपित-सी हो गयी ।
क्षण भर को यूँ लगा कि जैसे
हिलने लगे आसमां-धरती
मैं खुद में ही सिमटने लगी हूँ ।
गड़ी हैं निगाहें मुझ पर जमाने भर की ,
हर कदम डरके धरने लगी हूँ ।
मेरी विचित्र दशा देखकर
उसकी सहानुभूति जगी थी ।
शायद मेरी शक्ल-सूरत की
उसकी कोई बहन रही थी ।
तब उसने मुझसे बोला था -
"निस्संकोच कह देना तुम
जब हो जरूरत इस भाई की !"
सुनकर उसकी मृदु वाणी और
देखके आँखों में निश्छलता
मैं धरती में धँसने लगी हूँ ।
गड़ी है निगाहें मुझ पर जमाने भर-की
हर कदम डरके धरने लगी हूँ ।
इंतहा हो गई है मेरे डर की ,
मैं खुद से भी डरने लगी हूँ ।