💞💞बावरा यें मन💞💞
धरा पर गिरती बूंदों को देख,
मन यें महक उठा,
रोम रोम पुलकित हुआ देख,
काली मतवारी घटा......
सौंधी सी खुशबू मिट्टी की,
इत्र सी बिखर गई,
प्रकृति यें प्यासी सी,
बूँद पड़ी और सिहर उठी.....
तपती सी देह पर,
प्रेम की छुअन,
लाज से सिमटा जाए रे,
बावरा....यें मन.....
धरा पर छाएँ हैं, नभ,
मैं व्याकुल अधीर सी,
जल बन तुम,
बरसोंगें कब.....
बावरा यें मन,
करे है पुकार...
चले पी के पास,
करके सोलह श्रृंगार.....
जोगन बन गई,
इंतजार में तेरे,
देखने तुम्हे,
नैन तरसे मेरे.....
बावरे इस मन में,
बस प्रेम है, तुम्हारा,
एक तेरे मोह में,
सारा जहां तुम पें है, वारा.....!!!!!!
✍✍वर्षा अग्रवाल द्वारा रचित 🙏🙏