हे बिधाता
तुम सृजन मैं, सर्जना मैं
प्रलय मैं, प्रेरणा मैं
सादगी मैं, श्रृंगार मैं
दिल मैं, धड़कन मैं
प्यार मैं, समर्पण मैं
शांति का माध्यम मैं
समृद्धि का साधन मैं
सौम्य स्वभाब मैं, बिस्मय भाव मैं
शुन्य मैं, समाधी मैं
त्रिभुवन मैं, त्रिलोक मैं
प्रारम्भ मैं, प्रारब्ध मैं
आदि मैं अंत मैं.