मुंबई महानगर की एक चाल में रमेश एवं महेश नाम के दो भाई अपनी माँ के साथ रहते थे। रमेश अपनी पढ़ाई पूरी करके शासकीय सेवा में शिक्षक के पद पर चयन का इंतजार कर रहा था। वह बचपन से ही पढ़ाई में काफी होशियार था और शिक्षक बनना चाहता था। महेश का बचपन से ही शिक्षा के प्रति कोई रूझान नही था वह बमुश्किल ही कक्षा दसवीं तक पढ़ पाया था। वह क्या काम करता था इसकी जानकारी उसके घरवालों को भी नही थी परंतु उसे रूपये की तंगी कभी नही रहती थी।
एक दिन अचानक पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। रमेश और उसकी माँ को थाने में पहुँचने पर पता चला कि वह एक पेशेवर जेबकतरा है। यह सुनकर उनके पाँव तले जमीन खिसक गई। वे महेश की जमानत कराकर वापस घर लौट आये। माँ ने उससे इतना ही कहा कि यदि तुम यहाँ रहना चाहते हो तो यह घृणित कार्य छोड़ दो। बेटा क्या कभी तुमने सोचा कि जिसक जेब काटी उसके वह रूपये किस काम के लिये थे, हो सकता है कि वह रूपये उसकी माँ के इलाज के लिये हों, उसकी महीने भर की कमाई हो या फिर उसकी त्वरित आवश्यकता के लिये हों। उन्होने नाराजगी व्यक्त करते हुये उससे बात करना भी बंद कर दिया।
महेश अपनी माँ और भाई से बहुत प्यार करता था। उनके इस बर्ताव से उसे अत्याधिक मानसिक वेदना हो रही थी। वह आत्मचिंतन हेतु मजबूर हो गया और इस नतीजे पर पहुँचा कि बिना मेहनत के आसानी से पैसा कमाने का यह तरीका अनुचित एवं निंदनीय है। उसने मन में दृढ़ संकल्प लिया कि अब वह यह काम नही करेगा बल्कि मेहनत से पैसा कमाकर सम्मानजनक जीवन जियेगा चाहे इसके लिये उसे छोटे से छोटा काम भी क्यों ना करना पड़े तो वह भी करेगा।
दूसरे दिन से उसकी दिनचर्या बदल गयी थी, उसने एक चौराहे पर बूट पालिश का काम शुरू कर दिया था। यह जानकर उसकी माँ अत्यंत प्रसन्न हुयी और बोली कि कोई भी काम छोटा नही होता है। अपनी मेहनत एवं सम्मानजनक तरीके से कमाये हुये एक रूपये का मूल्य मुफ्त में प्राप्त सौ रूपये से भी अधिक रहता है।