उर्मिला
सुनो सौमित्रि !
रामायण का उपेक्षित किरदार हुँ
में भी सीता की तरह सहानुभूति की हक़दार हुँ ||
आज तुमसे कुछ पूछना चाहती हुँ
जनक नंदिनी में भी थी
पर जानकी नहीं कहलाई क्यों ??
सिया राम के भांति
नाम मेरा तुम्हारे साथ जुड़ ना पाई क्यों ??
सीता तो युग युग तक मशहूर
फिर लोक प्रिय में नहीं क्यों??
मूरत में भी सीता राम सांग तुम रहे
में उस सौभाग्य से बंचित क्यों??
मेरे त्याग, सहनशीलता पे तुम उदासी क्यों ??
में मानती हुँ सीता साध्वी हे
तो कया में तपस्विनी से कम हुँ ??
हे पति मेरे परमेश्वर मेरे सुन लो तुम
में किसी गुण से बैदेही से कम नहीं,
ये तो मेरी नियति हे जो सब भेद भाब मौन बन सहगयी
एक महान काब्य की अनालोचित पात्र बन रह गयी |||