क्यूँ ?
सवाल ज़रा टेढ़ा है ,
पर मेरा है ।
जब आँखो को कोई चीज़ अच्छी लगतीं है ,
क्यूँ अक्सर मुँह से तारीफ़ की आवाज़ें नहीं निकलती ?
अकसर लोगों के पास जो है ,
क्यूँ हमारे पास भी वो होना ज़रूरी है ?
देखा देखी भी बड़ी कमाल है ,
लेकिन क्यूँ अक्सर वो आदत सी बंजाती है ?
पैसा , रुतबा ये ही लोगों की ज़िंदगी बंजाती है ,
आख़िर क्यूँ इसमें ही ज़िंदगी निकल जाती है ?
गलती हमारी ,
तो दोषी कोई और क्यूँ ?
इश्क़ है ,
लेकिन क्यूँ इकरार नहीं ?
फ़िक्र है ,
तो क्यूँ जताते नहीं ?
जानते सब है ,
लेकिन मानते कहा है !
ज़िंदगी भी कमाल है ,
क्यूँ से शुरू होती है और क्यूँ पे ही ख़त्म !
ज़रा सोचिए , आख़िर क्यूँ ??
Poetry by • Jill शाह •