स्टेपनी
******
बात करें स्त्री पुरुष की मित्रता की तोआजकल यह मित्रता एक नया रूप दिखा रही है। पुरुष और महिलाएँ एक दूसरे को स्टेपनी की तरह इस्तेमाल करते हैं, तू नही तो और सही, और नही तो कोई और सही।
घर से बाहर दोनों ही अनेकों स्त्री पुरुषों के सम्पर्क में आते हैं जिसमें से कुछ मित्र तो कुछ घनिष्ट मित्र बन जाती या जाते हैं।
अब स्थिति तब रोचक बनती है जब एक साथ काम करते करते मित्रता पनपती है।
मित्रता के भी अनेकों स्तर है जिसकी वजह से सभी के साथ एक जैसे भाव नही रहते। कुछ करीब तो कुछ बेहद करीब।
धीरे धीरे मित्रता का रिश्ता प्रेम के रूप में परिवर्तित हो जाता है और फिर मित्रता में दी गयी छूट की जगह प्रेम के बंधन हावी होने लगते हैं।
स्त्री का ह्रदय अक्सर स्वभावगत संकीर्ण होता है, वह एक वक्त में किसी एक व्यक्ति को ही "विशेष" दर्जा दे पाती है जबकि पुरुष ह्रदय उदार होते और अनेकों स्त्रियों को "विशिष्टता" के भाव से सरोबार करते रहते हैं।
ऐसे में सन्तुलन तब डगमगाता है, जब पुरुष किसी विशिष्ट स्त्री को जब दूसरे पुरुष से बात करते देखते हैं। तब ईर्ष्या के भाव उसे उद्वेलित करते हैं। प्रतिक्रिया स्वरूप उस "विशेष"स्त्री की अवहेलना आरम्भ और दूसरी "विशिष्ट" स्त्री को तवज्जो देना आरम्भ करते हैं। गौरतलब है कि यहाँ पुरुष असमंजस की स्थिति में कुछ नही करता अपितु सोच समझ कर घटनाओं को क्रियांवित करता। वह स्त्री को छलते हुये खुद को छला हुआ साबित करता। विचलित न होते हुए भी विचलन दर्शाता।
कमोबेश यही स्थिति कुछ विशेष स्त्रियों की भी होती है और वह भी यही प्रक्रिया दोहराती रहती हैं।
कहने का मतलब यह कि स्टेपनी बनाकर महज पुरुष ही नही स्त्रियां भी रखती हैं।
अब यह तो स्टेपनी बनने वाला या बनने वाली जाने कि स्टेपनी बनने में आखिर मजा क्या है?
स्त्री हो या फिर पुरुष, स्टेपनी बनाने का कोई खास मकसद भी नही होता महज इतना मतलब होता कि छोटे मोटे काम आसानी से दूसरे के कंधे पर डाल कर निबटाये जाएं साथ ही थोड़ी देर के लिए नमक तेल लकड़ी के जंजाल से मुक्ति पाकर हल्के फुल्के पल जी लिए जाएं।
अब बात करते हैं महिलाओं में ही कुछ विशेष तरह की स्त्रियों की तो इस तरह की महिलाएँ उस पुरुष पर विश्वास करती है जिसके साथ वह स्वयं को मुक्त अनुभव करती है वह उसका पति भी हो सकता है।
जो पुरुष संवेदनशील, परिपक्व और इतना सहज हो कि उनके साथ कोई भी स्त्री अनौपचारिक हो सके और करीबी हो जाने के बाद भी उसको परखे जाने का डर न सताए, उससे स्त्री खुल कर मन की बात कहती।
जहाँ स्त्रियों की परख आरम्भ हुई, वहीं पर एक अद्रश्य आवरण से स्त्री स्वयं को आच्छादित कर लेती है। स्त्री का वास्त्विक स्वरूप वहीं खुलता है जहाँ उसे विश्वास भरी नजरों से देखा जाता।
विनय...दिल से बस यूँ ही