Hindi Quote in Poem by Siraj Ansari

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की कविता "भिक्षुक" में अगर भिक्षुक की जगह "गरीब या मज़दूर" कर दिया जाय तो भी बिल्कुल सटीक बैठती है आज के परिदृश्य में। एक मज़दूर की कल्पना करते हुए कविता को पढ़िए आपको एक लाचार, गरीब, मज़दूर पैरों में छाले लिए, सूखे होंठ और प्यास से व्याकुल गला दिखाई देगा....

वह आता--
दो टूक कलेजे के करता, पछताता
पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को — भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता —
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए !

ठहरो ! अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा
अभिमन्यु जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दुख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।

Hindi Poem by Siraj Ansari : 111439295
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