बेदना अंतर्मन का
नारी सब सहे उफ़ तक भी ना कहे
बात तुम्हारा मान के चले तो ठीक
प्रतिबाद करे तो नर्क का द्वार उसे कहते हो |
यह कैसा नियम बनाया, चार दीवारी मैं
सिमट के रहगयी उसकी दुनिया ||
धर्मशास्त्र ने भी डाल दी पेरो मैं उसकी बेड़ियाँ ||
ध्यान तुम ना दो और ज़रा सा भटक जाये वह तो
पतिता उसे कहलाते हो, गलती तुम करो
पर झुकने उसे कहते हो, उसकी ख़ामोशी से
कोई फरक नहीं पड़ता तुमको
शिकायत क्या करदे तो गरज पड़ते हो |||
उसकी इच्छाओं को दबाया किसने ?
उसको अंतर्मुखी बनाया किसने ?
इस प्रश्न का उत्तर दो
फिर भी देखो उसकी दर्यादिली को,
तुम्हारी जीबन को सरल बनाती हे,
तुमसे माफ़ी मांग लेती हे, तुमको माफ़ करदेती हे
सिर्फ अपने रिश्ते को बचाने को |||||