मुझको इतना तड़पाकर तुम, कौन सी मंजिल पालोगे
है वज़ूद तेरा मुझसे फिर, नई दुनिया कौन बसालोगे
जो न्याय रचा था हरि ने कभी, तेरा तुझको अर्पण वाला
वो मर्यादा तुम भूल गए, मुझे निर्वस्त्र और छलनी कर डाला
कई बार चेताया मैंने तुम्हे, सूखा, तूफान, ज़लज़लों से
मेरी तुमने न एक सुनी, न सीखा मेरी हलचलों से
हर चीज़ की एक हद होती है, जिसे लांघ गए पहले ही तुम
होकर मज़बूर भरे दिल से, है न्याय किया हो गया जो गुम
सेहत है कुछ सुधरी मेरी, मज़बूर दुबारा करना मत
अब तो सुधरो मेरे बच्चो, प्रकृति का अनादर करना मत
#न्याय