आजादी से उड़ने की आदत थी मेरी,
अपने हर सपने को पूरा करने की ख्वाहिश थी मेरी,
बचपन बीता नहीं की माता - पिता ने शादी करवा दी मेरी,
अब धीरे धीरे आजादी छीन ली गई मेरी,
दूसरों के लिए ही जीना, अपनी हर खुशी भूल जाऊं ऎसी सोच
बना दी गई मेरी,
दूसरों को खुश करते करते अपनी ही खुशी खो कहीं गई मेरी,
सास की रोक रूपी आंधी, समाज की बन्धन रूपी बेडिया,
पति की टोक रूपी जंजीरों में बांध दी कि जिंदगी मेरी,
उड़ती हुई आजाद चिड़िया थी कभी की अब,
किसी शिकारी द्वारा शिकार बन के,
एक आग के पिजरे में बंदी हुई एक जानवर कि जैसी कहानी बन गई मेरी,
#शिकार