मामूली सा पत्थर संगेमरमर लगता हे
मोहब्बत होजाये तो मकवारा भी ताजमहल लगता हे |
रातें सबनमी दिन खुशनुमा लगजाये
मोहब्बत सच्ची हो तो पत्थर भी भगवान बनजाये ||
अगर मगर काश में हुँ, देख में खुद की तलाश में हुँ
समंदर पे खड़े होके भी प्यास में हुँ |||
ना दिल को सुकून, ना रूह को चैन रहता हे
इंसान मोहब्बत में इंसान नहीं रहता हे ||||