लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहीं
तेरे जैसा कोई हमको मिला नहीं
ज़माने भर की बातें उनसे कह दीं
जो कहना चाहिए था वो कहा नहीं
वो सच में प्यार था या बचपना था
मोहब्बत हो गयी थी क्या पता नहीं
वो मुझको लग रहा था प्यार मेरा
वो जैसा लग रहा था वैसा था नहीं
ना रोया था बिछड़ने पर मैं उनके
मगर हाँ ज़िदगी में फिर हँसा नहीं
ये तोहफे हैं जो अपनों से मिले हैं
हमें गैरों से कोई भी गिला नहीं
- साजिद अली