कदम बढ़ाना चलते जाना,
कभी यूं खुद से ना घबराना,
थोड़ा समय भी ना गवाना,
कदम बढ़ाना चलते जानाl
निडर होकर चलने में,
समय के साथ बदलने में,
जीवन का रस चखते जाना,
कदम बढ़ाना चलते जानाl
हर कविता का सार तू,
खुद को जरा सवार तू,
दिल पर कोई ना बोझ बनाना,
कदम बढ़ाना चलते जाना।
अब कैसा घबाराना जग से
और कुछ क्या पाना जग से
जग को को कुछ देकर जाना
कदम बढ़ाना चलते जाना।।
#बढ़ना वंदना सिंह