आज मैंने तुम्हें बहुत वक़्त बाद देखा..
नहीं! दरअसल देखती रोज हूँ, मगर इतने करीब से, तुम्हारी आँखों में झाँककर, इतने गौर से तुम्हें मैंने आज बहुत वक़्त बाद देखा।
और देखा कि तुम में बहुत बदलाव आ गया है।
फिर तुम्हारी मुस्कुराहट मुझे बहुत झूठी लगने लगी, अरे वही मुस्कुराहट जो तुम्हारी तस्वीर में तुम्हारे चेहरे पर थी।
वही मुस्कुराहट जो हर वक़्त तुम्हारे चेहरे पर रहती है..
जो इस वक़्त भी है।
जब मैं तुम्हें देख रही थी गौर से, तो तुमने नज़र चुराने की बहुत कोशिश की हर संभव कोशिश की। है ना?
मगर मुझसे कुछ भी छुपा पाना नामुमकिन है।
आज मैंने यूँही तुम्हें किसी बहाने से जाने नहीं दिया।
मेरी खामोशी ने तुम्हें रोके लिए शायद..
सुनो,
ये जो बातों के पीछे, हँसी के पीछे छुपा हुआ, दबा हुआ, शोर है ना, वो मुझे तकलीफ़ दे रहा है।
वो अब मुझमें गूँजने लगा है।
जब से मैंने तुम्हें देखा है ना.... कुछ है, कुछ है जो.. तुम में दबा हुआ है, लेकिन मेरे सामने आ गया है.. एकदम सामने।
और मैं चाहकर भी खुद को उससे अलग नहीं कर पा रही हूँ।
मैं समझदार नहीं हूँ..
और तुम पर ये समझदारी का झूठा नक़ाब अच्छा नहीं लगता।
तो अब.. जब मैं तुम्हें आईने में देखूँ.. तो वही नज़र आना, जो हो..
लोगों के लिए, ये चलता-फिरता एक दिखावा, एक फ़रेब मत बनो।
यूँ तुम खुश होने का झूठा नाटक मत बनो।
तुम बाहर भी वही दिखो जो तुम अंदर हो।
मैं तुम्हें आईने में टूटा हुआ तो देख सकती हूँ, मगर प्रपंच करता हुआ नहीं।
और फिर.. मैं तुम्हें बिखरा हुआ भी स्वीकार कर लूँगी..
"तुम" और "मैं" एक ही तो हैं।।
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