रोज़ जब भी
अखबार पकड़ता हूं
तो हाथ सारे लाल हो जाते हैं
और
खुद का कुछ कोना
गुनहगार सा लगने लगता है !
रोज़ ही तो
अख़बार के पन्नों से कितने
ही खंजर झांकते हैं बाहर
और
आहत कर जाते हैं
मन को
पर धीरे धीरे ...
अब जाने क्यों
कुछ भी महसूस सा नहीं होता !
शायद
मेरी सभी संवेदनाओं का भी
कत्ल हो रहा है
धीरे धीरे ...
:- भुवन पांडे
#महसूस