पत्थरों को तोड़कर अट्टालिका बनाते हैं हमारे लिए
जो रहते हैं सड़कों,झुग्गी-झोपड़ियों में
क्या उनके भाग्य की रेखा में यहीं लिखा है?
अपना बचपन गवांकर बनाते हैं हमारे लिए प्लेग्राउंड
संसद में बैठने वालों के लिए संसद भवन
क्या ईश्वर ऐसे ही न्याय करता है?
वो मजबूर है शायद इसलिए मजदूर है,,
~सिद्ध