फूल खिलते नहीं,बादल छाते नहीं,जैसे ठंडी पवन का झोंका मुंह फेर गया
बहार आती नहीं,कोयल कूकती नहीं,सावन जैसे अपना रास्ता भूल गया
भंवरे गुनगुनाते नहीं,चिड़ियां चहकती नहीं,मयूर जैसे नृत्य करना भूल गया
झरनों में संगीत नहीं,वृक्षों की मस्ती नहीं,नदी जैसे
कलकल करना भूल गईं
पनघट पर उल्लास नहीं,सखियों संग हंसी ठिठोली नहीं, मन की हरियाली जैसे सूख गई
ये मनोरम नगरी क्यों उजाड़ हो गई,जैसे इसकी प्राणवायु कोई हर ले गया
कहीं इन सबका उत्तर तुमसे संबंधित तो नहीं,क्योंकि जब से तुम गईं, जैसे सारा जग रूठ गया
तुम आ जाओ तो फिर से बहार आ जाए,तुम्हारे दम से ये दुनिया फिर से गुलज़ार हो जाए
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