सुदंर कविता ..
विषय .रिश्तेदार ..
ये कैसे रिश्तेदार हैं ,ना पसंद वस्तु को भी गले मंढते हैं ।
सहारा बनने के बदलें ,सहारे की लाठी छिन लेते हैं ।।
दुःख में सहारा देने के बदले ,खिल्ली उठाते रहते हैं ।
सुख में बिन बुलाये मेहमान कि तरह ,गुलछरें उठाते हैं ।।
मदद करने के बदले ,धूल धूसरीत करते रहते हैं ।
आँसू पौछने के बदले ,असह्य आँसू दे जाते हैं ।।
हमदर्दी जताने के बदले ,बहुत दुःख दे जाते हैं ।
पेट में धुस कर ,दिल की बात जान लेते हैं ।।
फिर उसमें नमक मीर्च मिला कर ,बदनाम करते हैं ।
स्नेह की दो बात कर ,भेद की बातें जान लेते हैं ।।
इज्जत ढकने के बदले ,पगंडी उछालते रहते हैं ।
ऐसे रिश्तेदारो से सदा संभलना ,ये मुँह में राम बगल में छुरी रखते हैं ।।
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