शीर्षक:-"बस बढ़े मानवता का धर्म"
भले ही धरा पर आज मृत्यू के तांडव की आफत का कितना भयंकर आसमान टूटा,
पर ना जाने क्यों?
कोरोना के इस भयावह संक्रमण में भी इंसानी समाज से हिन्दू-मुस्लिम का घमासान ना छूटा।।
बस ये रट लगाए कि तेरा धर्म छोटा मेरा मज़हब बड़ा है,
सभ्य,शिक्षित इंसान आज भी अपने-अपने धर्मो को श्रेष्ठ बताने पर अड़ा है।।
क्यों ये जरा सी बात समझ नही आती कि मिलकर साथ लडेंगे तो भारी नही पड़ेगी कोरोना की मार,
सब देखते हुए भी धर्म का चश्मा औढ़े हुए इंसानो की बुद्धि में क्यों आता नही एकता का विचार।।
क्या किसी के कौसने से मिट सकता है कोई धर्म, या फिर किसी के कहने भर से छोटा हो सकता है वो सर्वशक्तिमान रब?
अगर नही!
तो फिर क्यों हम भूलते जा रहे हैं कि सबसे बढ़कर है मानवता का मज़हब।।
अपने-अपने धर्मों को बचाते इंसानो को अनंत से देख रहा ईश्वर-खुदा रहकर मौन,
अगर ना सुधरे,ना समझे तो प्रकृति की प्रलय के बीच ना रहेगा कोई धर्म, ना रहेगा इंसान,तो फिर मन्दिर-मस्जिद जाने को बचेगा कौन।।।
Aromatic Saurabh