खत
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अपनों को कुछ,
यूं याद करते थे
बैठ कर जब,
इतज़ार करते थे
भावों और शब्दों का,
जिस में मेल था,
वो खत था ,
न समझो ई-मेल था।
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अपनी बात,
जिस के जरिये,
पहुंचाई जाती थी,
कई घरों की चिट्ठी ,
जिसमें आती थी,
वो पत्र पेटी कहलाती थी
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित