सुदंर रचना ,श्रृंगार रस ....
चांद भी तेरी सुदंरता के आगे मन ही मन शरमाता हैं ।
सारा जग तुझे सुदंरता का खजाना जो कहता हैं ।।
तु तो नार नवेली सी सारे जग में इतराती हो ।
तेरी महिमा कहते हुए तो मां सरस्वती भी शरमाती हैं ।।
तेरा जो दीदार एक बार कर ले तो पल में तेरा हो जाता हैं ।
तेरे तीखे नयन बाणों से पल में धायल हो जाता है ।।
तेरा मधुर कंठ सुन कर तो कोयल टुंहुकना भुल जाती है ।
तेरी सुदंर चाल के आगे हथिनी भी लजा जाती है ।।
तु तो विश्व मोहिनी ठहरी सबके दिल को भाती है ।
तेरे जलवे के आगे तो विश्व सुदंरीयाँ भी पानी भरती है ।।
ईश्वर ने बनाया तुझको हुस्न की परी सा रुप देकर ।
देवता भी तुझे देख कर मोहित हो जाते ,मानव की क्या औकात हैं ।।
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