मैं उस शब्द में था
जो तुमने सुना नहीं,
मैं उस कर्म में था
जो तुमने देखा नहीं।
मैं उन ऋतुओं में था
जिन्हें तुमने समझा नहीं,
मैं उस स्पर्श में था
जिसे तुमने छुआ नहीं।
मैं उस समय में था
जिसे तुमने पहिचान नहीं,
मैं उस परिवर्तन में था
जिसे तुम जुड़े नहीं।
* महेश रौतेला