परिस्थितियाँ बदली तो हमने जाना मौन प्राण देता है.
प्रकृति को ,करना ही विकास नही, न करना भी विकसित करता है श्रृष्टि को ,
प्रकृति माँ सी कोमल मन है जो अपने बच्चो के अपराध को नजरअन्दाज करती रहती है.पर बच्चो को सुधारने का गुण भी अन्दर रखती है ,
वह काली बन सकती है पर कल्याणी बनकर सबकी पीड़ा हरती है , चोट भी करती है तो प्यार की छड़ी से डण्डे की भाषा नही धरती है.
यह केवल एक माँ ही कर सकती हैं जो नालायक बच्चो पर भी ममता रखती है. हम उसकी पीड़ा को कब समझेंगें और एक माँ की जिम्मेदारी पूरा करेंगे .
इतना विकास के लिए भी क्या दौड़ना कि विनास पर ही पैर रख दे. जिस गंगा मे डुबकी लगाते आयें हैं उसी मे अपना मल बहाते आये हैं .
हमे नहलाते खुद आप मैली हो रहीं पाप धुलने आईं थीं खुद मल मे डूबने लगी . अभी न चेते तो यह ,चेता देगी .
अभी प्रेम स्वरूपा कल्याणी हैं जो वो ,खुद को काली बना लेगी.