तुम्हें पत्र लिखूंगा
आकाश विशालकाय है,
धरती हरी-भरी है
पहाड़ गगनचुंबी हैं,
समुद्र खारा है
सरकारें आती-जाती हैं।
तुम शायद ये सब नहीं पढ़ोगे
आगे पत्र में तुम कुछ ढूंढोगे,
सरसरी दृष्टि घुमाओगे
अचानक रूक जाओगे
उस पंक्ति पर
जहाँ लिखी होंगी
प्यार की अद्भुत बातें,
तुम वहीं अटक जाओगे
बार-बार मुड़कर देखोगे,
सत्य की छांव को
प्यार के घुमाव को।
*महेश रौतेला