#परिपूर्ण
कैसे कैसे संवादों से मन की गगरी छलकाई है ,
जीवन तो है एक पहेली, ये ही तो दुःख की जाई है |
पूरे जीवन अहं भरा हो ,ऐसे कोई कहाँ निखरा है ?
कह लो तुम 'परिपूर्ण' स्वयं को झूठी आशा इठलाई है |
करने होते हैं कुछ वादे ,सपनों को जीने की खातिर ,
और भरम भी तोड़े जाते अहं यहाँ खोने की ख़ातिर |
झूठे रस्तों पर चलकर न यूँ 'परिपूर्ण' बना है कोई ,
बहुत बहुत बलिदान चाहिए अपनों संग जीने की ख़ातिर | |