पटना शहर में कइ तरह की बोलियाँ बोलने वाले लोग हैं जिनमें मगही, भोजपुरी और मैथिल प्रमुख है। इन सबसे अलग, पुराने पटना (पटना सिटी) की एक अलग सी बोली है। कुछ पंक्तियां इसी बोली में पेश हैं:
-भूखे का दर्द-
जो न्यौता मिल गया,
तो नास्ता भी,
न क्किया भोरे,
निलेसवा है बुलाइस,
आज ओके घर,
पे खाना है।
हम ओके घर गिये,
और एक घंटा,
हो गिया बैठे,
न सुगबुग कुछ,
किहिस कोई,
कि कुछ खानो
खिलाना है।
पुछते ऊ कहिस,
की आय! न्यौता
कल के लागी था,
न्यौता कोन,
दिन का था,
इ डेटवो सुन,
के जाना था।
कहा हम,
आए थे भुखले,
त ऊ बोलिस,
मजा ले कर,
की अब,
कुछ्छो नहीं है,
का तोरे,
बरतन दिखाना था?
देखावो,
कौन बरतन में,
तुम खिचड़ी
पकायो था,
खुरच के खा रहेंगे,
और कहेंगे,
तुम मेरे
खुरचन खिलायो था,
कहिस की,
धुत, रहे दो,
का मेरे
बरतन धुलाना है।
न तोरे है पता,
और ,
न ज्जाने,
हियाँ कोइ,
कि जे में,
थी पकी खिचड़ी,
गई केन्ने
उ बटलोई?
ऊ सौंसे
खा लियो अपने,
मेरे चूल्हा दिखाना था।
बुलायो था,
मेरे काहे,
जो खानो
न ख्खिलाना था,
तोरे घर पर
बना हलुआ,
मेरे घेलुआ
धराना था?
बड़ी देरी कियो,
अब देख लो,
कुछ खा,
न पांगे हम,
झुठ्ठो दे दियो न्यौता
मेरे बुड़बक
बनाना था?
अइयो अब,
मेरे दन्ने,
त हम भी,
देंगे कुछ न न्ने,
रिकटियो,
एगो बीड़ी को,
तोरे धुँआ
सुंघाना है।
अभी,
गुसियाए अंदर हैं,
मन है चींप दें नट्टी,
नहीं तो हौंक कर,
दे दें तोरे,
दू-चार गो फट्ठी,
मगर अब का करें,
घर हैं तोरे,
चुपचाप जाना है।
कोई पूछिस मेरे से,
बोल देंगे,
न बुलाइस था,
न त बोल देंगे,
ऊ मेरे पुरकस
खिलाइस था,
लेहाड़ी ले लियो
त अब,
मेरे इज्जत बचाना है।।'