अभिमन्यु
रक्त भानु सा चमक रहा था।
वो वीर बड़ा मनहारी था।।
नाम अभिमन्यु अर्जुन सुत।
उत्तरा का प्रियतम प्यारा था।।
था चला भेदने चक्रव्यूह जो
रच कौरवों ने डाला था।।
रहो यशस्वी युगों युगों तक।
कृष्णा से आशीष पाया था।।
लिखने शौर्य की अप्रितम गाथा।
चला वीर अभिरामी था।।
फंस गया कौरवों की कुटिल चाल में।
निष्प्राण हुआ वो रणभूमि में।
थी उम्र जो हंसने गाने की।
उत्तरा का साथ निभाने की।।
उस उम्र में कर गया नाम अमर था।
लाल सुभद्रा का अति प्यारा था।।
© निमिषा ।