कुछ तो दिन कह जाते हैं
मिलने की ही बात नहीं,
चलने की ही बात नहीं,
इनसे आगे ले जाते हैं ।
स्वयं साधु वे हो जाते हैं
सौभाग्य-स्वप्न वे बन जाते हैं,
आशाओं का नीड़ बनाकर
कुछ तो दिन कह जाते हैं।
बहुत पीड़ा में वे होते हैं
बहुत बोझ ये ढ़ोते हैं ,
बहुत क्रांतियों के दाता हैं
बहुत प्यार से लदे हुए हैं।
विस्तृत परिचय दे जाते हैं
उत्साह-उत्सव के दाता हैं
त्याग - तपस्या बन जाते हैं
कुछ तो दिन कह जाते हैं।
****** 2014
*महेश रौतेला