मैं एक आधा किसान और आधा मजदूर का बेटा हूँ
मेरे पिता के पास दो बीघा समतल और
तीन बीघा उबड़-खाबड़ ज़मीन है
इनमें से कुछ चौरहा तो कुछ बटइआ की शर्तों पर
किसी दूसरे किसान को दे दी गयी है वर्षों से
हर साल उपज जाते हैं कुछ अनाज जिससे
मेरी दादी बना लेती है मोटी-मोटी रोटियाँ
कुछ अच्छे चावल को बेचकर खरीद लेती है
नमक-गुड़,जीरा-गोलकी और सौ ग्राम हुमाध
बाकी बचे खुद्दी को बना लेती है गीला भात
इतने में ही खत्म हो जाती है मेरे घर की किसानी
शेष बचे हुए पिता रह जाते हैं एक मजदूर
उनके पास मजदूरी के बखत पहनने को
दो कम दामों की कमीज और पायजामा है
उन्होंने कमीजों का नाम दिया है ड्यूटी वाला शर्ट
माँ उसे धोते हुए हर रविवार को परेशान होती है
सुना है कि सालों पहले पिता ने रोपा था प्याज
दादी बताती है ज़मीन में धँसी थी बड़ी-बड़ी पोटियाँ
उसके बाद ख़ूब रुआँसा होकर कहती है
इंदर देवता इतना गुस्साए कि पोटियाँ
ज़मीन में ही रह गयी और गल कर हो गयी पानी
और उसी साल पिता जी ने हल-अरौवा फेंक
पहुँच गए लुधियाना,फिर बन गए मजदूर
मेरे पिता आत्महंता होने से बच गए।
©अमरदीप कुमार