उस धूप को क्या कहूँ
उस धूप को
क्या कहूँ
जो बासंती हो चुकी है,
उस आसमान को
क्या कहूँ
जो सदा ऊँचा रहता है।
उस नदी को
क्या कहूँ
जो तीर्थ बनाते जाती है,
उस गीत को
क्या कहूँ
जो बार-बार मन में आता है।
उस सुबह को
क्या कहूँ
जो बार-बार उठाती है,
उस उम्र को
क्या कहूँ
जो बचपन तक जाती है।
उस प्यार को
क्या कहूँ
जो जन्मभर गुदगुदाता है,
उस हाथ को
क्या कहूँ
जो सदा आशीषता है।
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*महेश रौतेला