मैं किससे कहूं कि अपने लिए कांटे मैंने स्वयं बोए,अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मैंने स्वयं मारी,अपनी दुनियां मैंने स्वयं उजाड़ी पर मैं करता भी क्या?कोई उपाय भी तो नहीं था पर मैने ऐसा सोचा कब था कि तुम इतनी दूर चली जाओगी इतनी दूर की मेरी आशाओं के सपने भी तुम तक न पहुंच सकेंगे,इतनी दूर;)