स्त्री के है रूप अनेक
जन्म लेके बेटी का
घर खुशियो से भर देती है,
भाई को अपने
माँ समान प्रेम देती है,
प्रेमी के सुख को
खुद का सुख बना लेती है,
अपने सम्मान के लिए
रणचंडी का रूप भी लेती है,
परिवार पर कष्ट आए तो
ढाल बन कर सब सह लेती है,
खुद की पीड़ा को
वह मुसकान में बदल लेती है,
पत्नी बन के प्रेमी की
हर व्रत तप कर लेती है,
माँ बन के बच्चों की
हर एक संभाल लेती है,
कोमल से अपने हृदय में
ना जाने कितने घाव जेल लेती है
आखिर स्त्री भावनाओ से
हर घर को खुशियो से भर देती है।।
Dilwali Kudi