"जब तक है एक आँख में आँसूं"
जब तक हैं एक आंख मे आंसू
जब तक द्वेष है घृणा है
जब तक जातियों मे बँटा समाज है
नम है मन दुःख भरी पीड़ा है
रोता हुआ चेहरा है
भूख है व्याकुलता है
है चेहरा मुरझाया सा
और कुछ पाने की आतुरता है
बोलो मे मुस्काऊं कैसे
गीत ख़ुशी की गाऊँ कैसे
हाथ पसारे वो तरसे कौड़ी को
और झोली भर ले जाये कोई
बोलो नज़रंदाज़ कर उसको
मैं उत्सव मनाऊं कैसे?
कोई तरसे बस एक को
और खाए पेट भर कोई
भूखा है जब तक एक भी आँचल
मैं भी जी भर खाऊं कैसे?
वो ऊँचे मंदिरों मे जाये
और कोई सीढियों पर बैठा तरसे
उस ईश को फिर कैसे पूजूं मैं
और इनको भुलाऊं कैसे?
कोई तरसता एक बूँद को
और कोई अमृत पान करें
बोलो बंटे से समाज को छोड़ कर
मै अपनी प्यास बुझाऊँ कैसे?
पूनम दहिया@