आदि अनादि अनंत महेस्वर।
घट घट के ये वासी हैं।।
कालों के हैं महाकाल।
गौरा के संग ब्याहे हैं।।
शीश चन्द्रमा सोहे है।
नाग गले में मोहे है।।
बाघमबर तन पर छायी है।
नीलकंठ की शोभा प्यारी है।।
लय देते संसार को हैं ये।
औघड़ अविनाशी कहलाते हैं।
आदि अनादि अनंत महेश्वर।
शिव शंकर भोले भाले हैं।।
~©निमिषा~
#अनंत