मन
इस मन की कश्मकश
कोई कहां समझता है,
दिल मे उठती कसक
हर अपना ही देता है ।
लोग अपने जहां में हैं कहां
कौन हैं, कैसे हैं, हैं क्या,
क्यों सब अपने ही बेगाने हैं
कोई अपना , एक भी, है क्या ?
सुन्दर आंखें अब झुकी ही रहतीं हैं
कितनी बातें करतीं थीं
अब चुप, सब देख भी सहती हैं ।
मन के बोल
मन में ही रह जाते हैं,
सब हजार किस्से सुनाते हैं
और हम, एक शब्द न बोल पाते हैं ।
रातें जो हसीन सपनों में गुजरती थी
अब करवटें बदल, घड़ी पर सुई अटकती है,
उन एकांत पलों का इन्तजार रहता है
जब हम खुद ही रूठ, खुद को मना लेते हैं ।
कहां सोचा था
कोई जहां ऐसा भी मिलेगा,
अपनों के बीच भी
हमारी कहानी का पन्ना ही न खुलेगा ।
फिर भी मन हंस ही लेता है
अंधेरी रातों में चिराग ढूंढ ही लेता है
प्यार कुछ खुद से करके
अपनी बाहों में ज़रा सिमट के
लम्हा- लम्हा ज़िन्दगी गुजार ही लेता है ।।