इन पहाड़ों का
दर्द सून रही हूँ...
जब रास्ता उन्हें
काट कर बनाया ,
तब उसने अपना
दर्द सुनाया होगा ,
उस मित्रों को ..
जो ..
रह रहें है उनकी
पनाह मैं पल रहे हैं,
वनो जंगलो को ..
उसमे रह रहे ..
वनयाप्रानियो को..
बस रहे मीठी तान
सुननेवाले खग पक्षियोंको,
अब मैं न बचा पाऊँगा
मित्रों इन मानवीयकरनको..
करो बसेरा जहाँ न पहुँचें
यह मानव जो ...
कभी अच्छा भी लगता है
पाठशाला जाते बच्चों को
देख जाते हुए जो अच्छी ..
तरह चल तो पाते है..
इन सड़कों पर ..
जहाँ थी कभी पगडंडी..
कही अच्छा तो
कही बूरा बना..
फिर भी दर्द तो हुआ..!
जयश्री पटेल
२२/२/२०२०