तुम क्या गये
रंगों के भी रंग
उड़ने लगे हैं...
ये लाल-नीले-पीले
सभी रंग
बदरंग हो चले हैं...
चले भी आओ
कि मैं अब भी
रंगों के ब्रुश
लिए खड़ा हूँ...
लेकिन जानता हूँ मैं
चला गया है वो जो रंग
ज़िन्दगी से...
वो अब ना वापस आयेगा
रह गया है बस
अब केवल एहसास ही,
फिर भी
ना जाने क्यों
रंगों के ब्रुश लिये
खड़ा हूँ...मैं!!!
© रविश 'रवि'