मेरा जैसा प्यार किसी और ने किया या नहीं
पता नहीं,
जो नदी सा निर्रथक बहता रहा
पर लोग उसे अर्थ देते रहे,
जो समुद्र सा उछलता रहा
पर खारा न हो पाया,
जो आंखों का कांटा बना
पर किसी को चुभा नहीं,
जो राहों पर लम्बा चला
पर कहीं पहुंचा नहीं,
जो सिक्के की तरह उछलता रहा
पर हाथ में आया नहीं।
*महेश रौतेला