My New Poem...!!!
यारों आप खर्च तो चाहे कितना भी करो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
दिल की हर ख़्वाहिश को ज़रूर अदा करो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रख
अपनी चादर जितने ही आप पैर फैलाओ
औरों की देखादेखी भी अगर आप करो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
माँग पेंदा आप अपने ज़हन में भी करो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
बजट-ओ-जेबें तो लड़ती आई हैं अक्सर
घरेलू ख़रीदारी में भी ध्यान यही आप रखो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
दिल की ज़िद के अरमान भी कतल करो
जीत-ओ-हार दोनों ही तो पनपते जेब में
क़ाबू कुछ तो अपने-आप पर भी तो रखो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
बचाओगे तब ही तो सुकून से जी पाओगे
हर अतिशयोक्ति से ही बूरा वक़्त जन्मता
बहकते कदम दानिशमंदी इख़्तियार करो
पर हर वक़्त जेब भी अपनीं कुछ तंग रखो
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