में तुम और शाम
धुंधला सा था समा,
आसमा चुप हो गया।
मिले दिल से दिल,
फासला कम हो गया।
खलिश सारा खत्म हो गया
राहे रूहानी सी हो गयी।
बह चले आँसू आंखों से
हसीन ये शाम हो गयी।
मिले जब हम तुम
ज़िंदगी मुकम्मल हो गई।
दरिया और आसमा एक हुए
छायी धूप सुहानी हो गई।
हवा का हल्का सा रुख था।
उसमे छाया हुआ सुकून था।
में था, तुम थी
और वो डूबता सूरज था।
खामोश थे बोल,
आंखे बातूनी सी हो गई।
नज़र से नज़र कुछ यूं मिली,
नफरत राख सी हो गई।
- Prachi Patel