गुरूदक्षिणा
आचार्य रामदेव के सान्निध्य में अनेक छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे, उनमें से एक केशव अपनी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत गुरूजी के पास जाकर उन्हें गुरूदक्षिणा हेतु निवेदन करता है। गुरूजी उसकी वाणी से समझ जाते हैं कि इसे मन में अहंकार की अनूभूति हो रही है। वे गुरूदक्षिणा के लिये उसे कहते है कि तुम कोई ऐसी चीज मुझे भेंट कर दो जिसका कोई मूल्य ना हो और जिसकी कोई उपयोगिता ना हो।
केशव यह सुनकर मन ही मन प्रसन्न होता है कि गुरूजी तो बहुत ही साधारण सी भेंट मांगकर संतुष्ट हो जाऐंगे। वह जमीन से मिट्टी उठाकर सोचता है कि इसका क्या मूल्य है तभी उसे महसूस होता है कि जैसे मिट्टी कह रही है कि वह तो अमूल्य है वह अनाज की पैदावार करके भूख से संतुष्टि देती है उसके गर्भ में अनेक प्रकार के खनिज एवं अमूल्य धातुऐं छिपी है इनका दोहन करके मानव धन संपदा पाता है। ऐसा भाव आते ही केशव मिट्टी को छोड़ देता है और पास में पडें हुऐ कचरे के ढेर में से कुछ कचरा यह सोचकर उठाता है कि यह तो बेकार है इसका क्या मूल्य हो सकता है वह कचरा मानो उससे कहता है कि मुझसे ही तो खाद बनती है जो कि खेतों में पैदावार को बढाने में उपयोगी होती है।
केशव उसे भी वापिस फेंक देता है और मन ही मन सोचता है कि ऐसी कौन सी वस्तु हो सकती है जिसकी कोई उपयोगिता एवं मूल्य ना हो ? उसको कुछ भी समझ में ना आने पर वह वापिस गुरूजी के पास जाता है और कहता है कि इस सृष्टि में बेकार कुछ भी नही है जब मिट्टी और कचरा भी काम आ जाते हैं तब बेकार की चीज़ क्या हो सकती है ?
गुरूजी ने उसे अपने पास स्नेहपूर्वक बैठाकर बताया कि अहंकार ही एक ऐसी चीज है जो व्यर्थ है और यदि इसे अपने मन से हटा दो सफलता के पथ पर स्वयं आगे बढते जाओगे। केशव स्वामी जी का भाव समझ गया और उसने मन में प्रण कर लिया कि अब वह अहंकार को त्याग कर गुरूजी के बताए मार्ग पर ही चलेगा।