दौड़ना और तेज दौड़ना संभव नही होता, उसकी अपनी एक मिंयाद होती है। उम्र के हिचकोले और समाजिक परिवर्तन को पछाड़ना, नये पल्लवित होते पत्तों का अल्प ही सही अपना वर्चस्व होता है, फिर नये ...फिर नये.....यूँ ही जिन्दगी की जमीं पर उगते रहते हैं नित्य नये पल्लव, अपने नये रंग, नयी खुशबू और आकर्षण के साथ, जहाँ पीले, सूखे और मुरझाये पत्तों का बुहारना ही बेहतर होता है.....
.............................................मेरी नई कहानी का कुछ अंश
छाया अग्रवाल