तुम्हें चाहने में
तुम्हें चाहने में
संतोष बहुत था,
कथा का पात्र बनने में
तृप्ति बहुत थी।
शब्दों से परे रहने में
अर्थ बहुत थे,
पगडण्डियों की भटक में
सारांश अनन्त था।
विराट हिमालय का
लगाव सुखद था,
आकाश की अनन्तता से
जुड़ाव सहज था।
पुरखों की धरोहर में
विश्वास अटल था,
प्रतीक्षा की घड़ियों में
स्नेह अथाह था।
महकते क्षणों में
प्रवाह सरल था,
संघर्षशील समय में
इतिहास जटिल था।
तुम्हें चाहने में
संतोष बहुत था।
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**महेश रौतेला